
सांसदों के वेतन बढ़ोतरी के बाद पंचायत प्रधानों को वेतन देने की कवायद
राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन, होगी ग्रासरूट संस्थाओं को मजबूत करने की पहल
विनोद भावुक, मंडी
ऐसे में जबकि नरेगा जैसे कार्यक्रम के बाद प्रत्येक पंचायत में हर साल औसतन 70 लाख से 15 करोड़ तक की राशि विकास कार्यों पर खर्च हो रही है। पंचायतों में करोड़ों के विकास कायो्रं के कियान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों की अहम भूमिका है लेकिन इसकी एवज में इस प्रतिनिधियों को नाममात्र का मानदेय दिया जा रहा है। ऐसे में पंचायती राज संस्थाएं भ्रष्टाचार की दलदल में डूब रही हैं। एक सर्वे के मुताबिक प्रदेश की अस्सी प्रतिशत पंचायतों में भ्रष्टाचार व्याप्त है। अगर पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकाओं के जनप्रतिनिधियों को सम्मानजक वेतन मिलता है तो न केवल इस संस्थाओं में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर योग्य प्रतिनिधि चुन कर आएंगे। दपंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकाओं के जन प्रतिनिधियों के लिए वेतन की वकालत के लिए भाजपा के दिज्गज नेता शांता कुमार पहल करेंगे। इस सिलसिले में जल्द ही मंडी में सामाजिक संस्थाओुं की ओर से आयोजित एक सेमीनार का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शांता कुमार भाग लेंगे।
, वर्तमान परिदृश्य :
वर्तमान समय में एक पंचायत एक वित्त वर्ष में मनरेगा और अन्य स्कीमों के तहत औसतन 70 लाख से 15 करोड़ तक खर्च कर रही है। प्रधान और अन्य चुने हुए प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में विकास की योजनाएं बनाने, विकास कार्यों के निरीक्षण और कार्य निष्पादन के लिए अहम एजेंसी है। प्रधान का काम तो ऐसा है कि उसे हर समय अपने कर्तव्य के लिए तत्पर रहना पड़ता है। प्रधानों के पास अपने विभिन्न तरह के कामों से संबंधित मिलने वालों का तांता लगा रहता है और उसे खुद भी विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और सरकारी कार्यालयों में जाना पड़ता है। यहां तक कि विभिन्न विवादों के निपटारन के लिए उसे न्यायिक शक्तियां तक प्रदान की गई हैं। इन सव की ऐवज में उसे न के बराबर मानदेय दिया जा रहा है। ग्रामीण स्तर पर स्वस्थ लोकतंत्र के विकास के लिए इस स्थिति को बदलना जरूरी है।
कम मानदेय भ्रष्टाचार का कारण :
पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। एक सरकारी एजेंसी के सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश की 80 प्रतिशत पंचायतें भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं। इस भ्रष्टाचार के पीछे की वजह साफ है। प्रदेश में प्रधानों को जो मानदेय सरकार की ओर से दिया जा रहा है उससे कोई भी प्रधान अपने मिलने वालों को रोजाना दस कप चाय तक नहीं पिला सकता है। दूसरी ओर अगर प्रधान अपने मिलने वालों को चाय का एक कप भी ऑफर नहीं कर सकता है तो उसे अपने रुतबे के जाने का डर रहता है। ऐसे में प्रधानों को अपने खर्चों के लिए वैकाल्पिक व्यवस्था बनानी पड़ती हे। यहीं से भ्रष्टाचार की शुरूआत होती है।
वेतन से मिलेंगे योग्य प्रधान
अगर पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों के प्रतिििनधयों को सम्मानजनक वेतन मिलता है तो योगय और शिक्षित उम्मीदवार इस संस्थाओं के चुनावों में बढ़ चढ़ कर भाग लेंगे और इस स्थिति में योग्य, शिक्षित और युवा प्रतिनिधि चुन कर पहुंचेगे। ऐसे में पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकाओं में सेवारत अधिकारियों व कर्मचारियों के ऊपर प्रतिनिधियों का दबाव बनेगा। ऐसे में इस संसथाओं में गहरे तक घर कर चुके भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकेगा। अगर इस संस्थाओं को सदृढ़ करना है तो इस संस्थाओं में चुन कर आने वाले जन प्रतिनिधियों को आर्थिक राहत देना जरूरी है।
No comments:
Post a Comment